Friday, 2 November 2012

कुछ लिखना भी जुर्म है


इन  सर्द रातों में
अजब सुगबुगाहट सी होने लगी है,
लोग आग खोजते हैं,
और हम शबनम
तलाशने लगे हैं !
अब तो कुछ लिखना भी
जुर्म हो चला है,
क्या करें ??
मेरी ग़ज़लों   से  तेरी सूरत
कुछ  इस कदर मिलती है ,
की लोग तुझे
मेरा महबूब तक कहने लगे हैं!!!!

Monday, 23 April 2012

वर्चुअल प्यार

जब  किया नहीं तेरा दीदार
सुनी नहीं आज तक तेरी आवाज़
थी हमारे  बीच वर्चुअल रियलिटी की दीवार
फिर समझ नहीं आता  यार!!!!!
कैसे हो गया ये प्यार?????


चेट करते वक़्त किये तेरी प्रोफाईल-पिक के  दीदार बार बार हज़ार बार..
हाय!!!!जब हुई, स्काइप पर तुमसे ऑंखें चार,
खुदा कसम ...बिना सोई बीतीं रातें चार,
फेसबुक के इन्बोक्स में हमेशा तेरे एक  मेसेज  का इंतज़ार...
फिर भी आज तक नहीं हुआ तेरा दीदार...
और आज भी समझ नहीं आता यार...
आखिर हुआ कैसे ये प्यार ????

Tuesday, 27 March 2012

वो स्याह राह.................

जिस राह पर चल रहे थे,
देखने में काफ़ी सुनसान थी
लेकिन चलते-चलते पसंद आने लगी
शायद दोस्ती हो चली थी उसके साथ
रास्ता काफ़ी स्याह लगता था दूर से
लेकिन हमारा अपना  था,
तो कोई एक शब्द भी कह  दे तो ,नागवार था हमे,
रौशनी से दूर-दूर तक कोई वास्ता नही था,
लेकिन शायद किस्मत को वो हमारा स्याह अकेलापन रास नही आया
और ना जाने कहा से आई उस अंजान ?????
 एक तरन्नुम ने रोशन कर दिया जहाँ ,
आदत नही थी इसीलिए शुरुआत में काफ़ी अटपटा लगा करती थी,
आँखों में चुभती थी,
लेकिन आदत से मजबूर ,क्या करते ????
हर किसी से दोस्ती करने की बुरी आदत जो डाल रखी थी,
उसे भी ना चाहते हुए अपना लिया.....
शायद धीरे से उसकी आदत हो चली थी अब.
लेकिन  वक़्त!!!!!!
 उस वक़्त को आज भी कोसते हैं,
जिस वक़्त उस रौशनी से मिले
जिस ने राह एक नयी  दिखा दी...
और भटका दिया इस,राहगीर को,
जानते हैं किस्मत मे नही है वो
लेकिन इंतेज़ार है आज भी उसका
क्योंकि शायद कही ना कही , इस ज़िंदगी मे
तुझसे राबता रहेगा ही.

काश वापस लौट जाए ये

स्याह राह.....................

Wednesday, 25 January 2012

आखिर गलती कहाँ हुई??????????

आज दिल से पूछा..कि...
आख़िर ग़लती कहाँ हुई????
पिछले पन्नों मे झाँक कर देखा..कि ....
आख़िर ग़लती कहाँ हुई????
वक़्त की सुइयों से पूछा...कि...
आख़िर ग़लती कहाँ हुई????
उसके दर पर गये और पूछा...कि....
आख़िर ग़लती कहाँ हुई????
...
...
लेकिन जब इत्मिनान  से सोचा
तो खामोशी ने एक ही जवाब दिया
कि.................................
ग़लती न तुम्हारी थी ....ना उसकी ...!!!!
ग़लत वक़्त था ...जो बीत गया....
जिसे तुम समझ ना सके ....
"बस ग़लती वहाँ हुई...!!!! 

Sunday, 8 January 2012

इक्कीसवी सदी का त्रास "बाप "!!!!!

 पिता ने पुत्र के चरण स्पर्श किये और पूछा "क्या आज्ञा है मेरे लिए ???"
पुत्र ने कहा "हे चिरंजीवी  बाप इस से पहले शुरू करू वार्तालाप .....एक बीडी तो पिलाइए
और पाँव ज़रा धीरे से दबाइए...!!!!

 पिता ने पुत्र की बीडी सुलगाई ..और खुद भी खेंच के ऐसी दम लगाईं की
की बीडी के प्राण-पखेरू उड़ गए .
पुत्र के  होठ मारे गुस्से के सिकुड़ गये..
पुत्र बोला......" अबे तू बाप है या फजीता है ....
भला बेटे के सामने कोई बीडी पिता है ........????
और जोरू के गुलाम,
यूँ ही रोशन करेगा  बेटे का नाम!!
क्या ज़माना आ गया है ....बाप बेटे  के सामने बीडी पिता है,
शर्मदार  बेटा भला इस दुनिया में कैसे जीता है !!

बेटा पिए तो कोई बात नहीं ..आखिर दमे का मरीज़ है ....
कोई इन बापों को समझाओ की आखिर ये भी कोई पीने की चीज़ है ?????

क्यों बे कलयुग के प्रभाव तुझ पर भी पड़ गया है????
मोहल्ले के आवारा बापों के साथ रह-रह कर तू भी बड़ा बिगड़ गया है!!!!

हर हसीं बुढ़िया से इश्क फरमाने लगा है....
और रिडक्शन का माल भी बड़ा भाने लगा है !!!

 ये मास्टर भी हराम का खाते हैं,
ना जाने  इन आवारा बापों को क्या पढ़ाते हैं.....????

अबे सावन के धंधे,
यथार्थ के धरातल पर आ,,,,
फिर जा कल्पना की वादियों में जा लेटा .....
बाप ने कहा- वाह बेटा,
इस इक्कीसवी सदी का त्रास हूँ   ,
दुर्भाग्य से तू मेरा बेटा और में तेरा बाप हूँ .


अतीत हमेशा अपने वर्तमान से हारा है,
शेख मुजीब को भी उसके बेटे ने मारा है...!!!