Tuesday, 30 July 2013

वक्त की अलगनी



बीते वक्त की अलगनी पे लटके,वो गुज़रे लम्हे,
एक हलकी हवा के झोंके से,ही याद आ जाते हैं,

कुछ सबाब से भरी नन्हीं बूंदों के छींटे दे जाते हैं,
कुछ अँधेरी रात का साथ याद दिला जाते हैं,

न हो ऐसी धूप जो सुखा दे इन यादों की सीलन,
कुछ ऐसे भी लम्हे संजो कर बरसों से रखे हैं,

जो न तो सबकी किस्मत के पास होते हैं,
और न सबसे सांझां किये जाते हैं.

Wednesday, 24 July 2013

...........कागज़ और हस्ताक्षर........



रूमानियत से ऊब कर,
सपने बिखर कर टूटने लगे हैं..
सावन की आस में,
बनास के पार टूट चले हैं,
ऐसे में कुछ दिन और समझल लो
शायद.....
जीवन के कागज़ से
सांसों के हस्ताक्षर मिटने लगे हैं.

इस चीखती ख़ामोशी के शोर से,
लबों के ताले टूट चले हैं,
क्यों है ये रंजिश-ए-दिल्लगी?
दरम्यान दूरी के जाले बुन ने लगे हैं.
ऐसे में कुछ दिन और सम्हाल लो
शायद....
जिंदगी के कागज़ से,
सांसों के हस्ताक्षर मिटने लगे हैं.

क्यों ये फितरत और नफरत के, 
ग़ुबार उठने लगे हैं ?
अब तो वक्त की भी हैसियत नहीं,
ऐसे ख़याल छंटने लगे हैं,
ऐसे में कुछ दिन और सम्हाल लो
शायद....
जिंदगी के कागज़ से 
सांसों के हस्ताक्षर मिटने लगे हैं.
.......................................(बंसीवार)

----अप्रत्यक्ष प्रमाण----



एकान्तता की हींस में फंसा मन 
शायद अब विक्षुब्ध हो चला है.
हजारों अंतर्द्वंदों को समेटे
अनेक विचारों से रक्त रंजित 
मात्र एक आशा के सहारे
अपनी आखिरी साँसें गिन रहा है.
वेगों से उद्वेलित,आभासों से प्रकीर्ण
अनुभूति से पुलकित,अभिव्यक्ति से क्षीर्ण
अविश्वास,अघात,विद्वेष,निष्ठा-पराकाष्ठा,
प्रेम,कोमलता,छलावा,अघात,प्रतिष्ठा,
सबकी दुहाई दे चला है,
एकान्तता की हींस में फंसा मन 
शायद अब विक्षुब्ध हो चला है.......!!

-----------डॉली बंसीवार------------------