इश्क अगर मेहरबान रहे, जहान-ए-मुहब्बत गुलिस्तान रहे मज़लिस-ए-तकदीर के आफ़ताब में, खडे कसम खाते हैं सनम, खु़दा से राबता हुआ तो, यही दुआ मांगेंगे, जि़दगी की हर सांस पे तेरा नाम रहे.........
ऐसा नहीं है, कि मेरे 'इंतज़ार' की उसे ख़बर नहीं हो, रुलाना तो खै़र उसकी पुरानी आदतों में ही शुमार है, गर रूठ कर ही सूकून आता है,तो हम दिल को समझा लेंगें, दुआ रहेगी हमेशा,तेरी जिंदगी में 'इंतजार' की जगह नहीं हो।