एकान्तता की हींस में फंसा मन
शायद अब विक्षुब्ध हो चला है.
हजारों अंतर्द्वंदों को समेटे
अनेक विचारों से रक्त रंजित
मात्र एक आशा के सहारे
अपनी आखिरी साँसें गिन रहा है.
वेगों से उद्वेलित,आभासों से प्रकीर्ण
अनुभूति से पुलकित,अभिव्यक्ति से क्षीर्ण
अविश्वास,अघात,विद्वेष,निष्ठा-पराकाष्ठा,
प्रेम,कोमलता,छलावा,अघात,प्रतिष्ठा,
सबकी दुहाई दे चला है,
एकान्तता की हींस में फंसा मन
शायद अब विक्षुब्ध हो चला है.......!!
-----------डॉली बंसीवार------------------
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